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18 जुलाई 2010 से प्रत्येक पोस्ट में उठाई गई समस्या के समाधान से संबंधित पोस्ट भी प्रकाशित की जाएगी! पहले पूर्व प्रकाशित समस्याओं का समाधान प्रस्तुत किया जाएगा! फिर एक सप्ताह के भीतर ही समस्या और उसके समाधान संबंधी पोस्ट प्रकाशित करने की योजना है! अपरिहार्य कारणवश ऐसा नहीं हो पा रहा है!

मिलत, खिलत, लजियात ... ... .



"कहत, नटत, रीझत, खिजत; मिलत, खिलत, लजियात।

भरे भौन में करत हैं, नयनन ही सों बात।।" 



कविवर बिहारी द्वारा रचित इस लोकप्रिय दोहे में 
किस अलंकार का प्रयोग हुआ है? 


आप सब से अनुरोध है कि इस अलंकार से युक्त 
कुछ अन्य उदाहरण प्रस्तुत कीजिए! 


अगर स्वरचित उदाहरण प्रस्तुत करेंगे, 
तो "हिंदी का शृंगार" अधिक अच्छा लगेगा!

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक  – (12 जनवरी 2010 को 7:46 pm)  

मैं इस पोस्ट से सम्बन्धित अलंकारयुक्त
स्वरचित पंक्तियाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ-

"आशा पर संसार टिका है।
आशा पर ही प्यार टिका है।।

आशाएँ ही वृक्ष लगाती,
आशाएँ विश्वास जगाती,
आशा पर परिवार टिका है।
आशा पर ही प्यार टिका है।।"

रावेंद्रकुमार रवि  – (12 जनवरी 2010 को 9:57 pm)  

मयंक जी हमेशा अंत में ही आते हैं!
इस बार उन्होंने पहल की है!!
आभार!!!

राज भाटिय़ा  – (13 जनवरी 2010 को 12:05 am)  

"कहत, नटत, रीझत, खिजत; मिलत, खिलत, लजियात।

भरे भौन में करत हैं, नयन ही सों बात।।"
अजी अलंकार तो पता नही, लेकिन यह दो लाईने बहुत कुछ कह रही है... कहना, मना करना, रीझना, खीजना, मिलना, खुश होना ओर फ़िर शर्माना... ओर फ़िर मोन धारण करना बस नयन ही सारी बात कहते है, यह एक प्रेमिका के सिवा ओर कोन करेगा, मन मोह लिया आप की इन लाईनो ने
धन्यवाद

डा. श्याम गुप्त  – (13 जनवरी 2010 को 8:01 pm)  

श्याम पदावली से एक स्वरचित पद प्रस्तुत है---
सखी री नैना मिलाइ गयो श्याम |
मोहिनी मूरत हिये समाय गयी सांवरिया घनश्याम |
अब न परत कल मन तरसत सखि निरखूं आठों याम |
कुञ्ज गलिनि में राहन रोकी पूछन लाग्यो नाम |
दधि माखन लै कित तुम जावौ किंधों तिहारो गाम |
काहे गोरस मथुरा भेजौ तजि वृन्दावन धाम |
फोरी गगरी वंशी बजैया जसुमति सुत अभिराम |
श्याम,श्याम-श्यामा लीला लखि श्याम ह्वे गयो श्याम ||

रावेंद्रकुमार रवि  – (13 जनवरी 2010 को 10:11 pm)  

वाह डॉक्टर साहब!
स्वागत है आपके इस अनूठे पद का -
"हिंदी का शृंगार"
पर!

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी  – (13 जनवरी 2010 को 10:43 pm)  

कक्षा आठ में जो हिन्दी पढ़ी थी उसके स्मृतिशेष ज्ञान के आधार पर बता सकता हूँ कि यह अनुप्रास अलंकार का एक उप-प्रकार है जिसमें एक ही ध्वनि की बारम्बारता किसी वाक्य के सभी शब्दों के ‘अन्त में’ आती है। इसे अन्त्यानुप्रास कहते है। अनुप्रास अलंकार का दूसरा प्रकार जो ज्यादा प्रयुक्त होता है उसमें किसी वाक्य या वाक्यांश के सभी शब्द एक ही ध्वनि या अक्षर से प्रारम्भ होते हैं, जैसे- तरनि तनूजा तट तमाल तरुवर बहु छाए; या, चारु चन्द्र की चंचल किरणें खेल रही थी जल-थल में।

विशेष प्रकाश दूसरे विद्वान डालेंगे।

रावेंद्रकुमार रवि  – (13 जनवरी 2010 को 11:03 pm)  

धन्यवाद, त्रिपाठी जी!
आपकी ही प्रतीक्षा थी!
मैं तो सोच रहा था कि
अलंकार का नाम
कोई बताना ही नहीं चाह रहा!

PADMSINGH  – (1 जुलाई 2010 को 7:53 am)  

जवाब आ चुका है ... धन्यवाद !! दोहे मे एक गलती रह गयी है सुधार कर लें मात्राएँ कम हो रही हैं
"कहत, नटत, रीझत, खिजत; मिलत, खिलत, लजियात।

भरे भौन में करत हैं, नयन(नयनन) ही सों बात।।"

रावेंद्रकुमार रवि  – (1 जुलाई 2010 को 3:00 pm)  

किसी ने इस ओर ध्यान ही नहीं दिलाया
और मैं भी देख नहीं पाया!
--
पद्म जी का बहुत-बहुत आभार,
जो उन्होंने इस ओर ध्यान आकृष्ट किया!
--
भूलवश यह त्रुटि रह गई थी!
अब इसका निराकरण कर दिया गया है!
--
नयन को "नयनन" से विस्थापित कर दिया गया है!

Unknown  – (27 नवंबर 2016 को 11:20 am)  
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
swadha tripathi  – (27 नवंबर 2016 को 11:41 am)  

नैनों के माध्यम से रीझने की बात की गयी है

swadha tripathi  – (27 नवंबर 2016 को 11:43 am)  

यहाँ पर नायक नायिका की आँखों से रीझकर उससे लजाते हुए अपने ह्रदय के भावों को व्यक्त कर रहा है

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